Tuesday, 28 April 2020

तोटकाष्टकं या श्रीशङ्करदेशिकाष्टकम्

तोटकाष्टकं या श्रीशङ्करदेशिकाष्टकम्

विदिताखिल शास्त्रसुधाजलधे महितोपनिषत्कथितार्थनिधे ।
हृदये कलये विमलं चरणं भव शंकर देशिक मे शरणम्॥१॥

है शास्त्रों के अमृत का पान करने वाले, उपनिषदों के रहस्यों को पहचान ने वाले गुरुदेव (आदि शंकराचार्य) में आपको हृदय पूर्वक नमन करता हूँ| है शंकर मुझे अपनी शरण में ले लीजिए|

भावार्थ: यहाँ पर आदि शंकराचार्य के शिष्य तोटकाचार्य द्वारा आदि शंकराचार्य को प्रार्थना की गयी है कि  शास्त्रों के समुद्र को पी जाने वाले और उपनिषदों के गूढ़ रहस्यों को जान लेने वाले भगवान शंकर मुझे अपनी शरण में ले ले (ताकि में भी ज्ञान के उस दिव्य मार्ग पर चल आगे बढ़ सकु)

 

करुणावरुणालय पालय मां भवसागरदुःखविदूनहृदम् ।

रचयाखिलदर्शनतत्त्वविदं भव शंकर देशिक मे शरणम्॥२॥

है करुणा के सागर ! भवसागर के दुःख से पीड़ित हृदय वाले मेरी रक्षा कीजिए, मुझे सर्व शास्त्रों के सार तत्व को जाने वाला बनाइए, है शंकर मुझे अपनी शरण में ले लीजिए|

भावार्थ: यहाँ पर करुणा से भरे हुए आदि शंकराचार्य को दुखों से भरे इस संसार रूप सागर में शास्त्र रूप नौका के माध्यम से  पार करने के लिए सहाय करने की प्रार्थना की गयी है|

 

भवता जनता सुहिता भविता निजबोधविचारण चारुमते ।

कलयेश्वरजीवविवेकविदं भव शंकर देशिक मे शरणम्॥३॥

आत्म ज्ञान की प्राप्ति के लिए जिनका मत (विचारधारा) श्रेष्ठ है ऐसे आप (आदि शंकराचार्य) द्वारा ही जनता का कल्याण होगा| मुझे ईश्वर और जीव के विवेक का ज्ञान दीजिए, है शंकर मुझे अपनी शरण में ले लीजिए|

भावार्थ: यहाँ पर लोगों के कल्याण के लिए आत्मज्ञान को श्रेष्ठ साधन माना गया है| इसीलिए ईश्वर और जीव से संबन्धित ज्ञान की प्राप्ति के लिए सहाय करने की प्रार्थना की गयी है|

 

 

भव एव भवानिति मे नितरां समजायत चेतसि कौतुकिता ।

मम वारय मोहमहाजलधिं भव शंकर देशिक मे शरणम्॥४॥

आप (आदि शंकराचार्य) स्वयं भगवान शंकर का ही अवतार हो ऐसा जानकार मुझे अत्यंत आनंद की अनुभूति हो रही है| महा मोह रूप सागर  से मुझे बचाइए, है शंकर मुझे अपनी शरण में ले लीजिए|

भावार्थ: यहाँ पर आदि शंकराचार्य को भगवान शिव का ही रूप माना गया है| इसीलिए भवसागर से बचाने की प्रार्थना स्वयं भगवान से की गयी है|

 

सुकृतेऽधिकृते बहुधा भवतो भविता समदर्शनलालसता ।

अतिदीनमिमं परिपालय मां भव शंकर देशिक मे शरणम्॥५॥

कई जन्मो के पुण्य कर्मों के बाद आप जैसी आत्मवत सर्व भूतेषु (सब को समान देखने) की दृष्टि विकसित होती है| (इस संदर्भ में) अत्यंत में अत्यंत दीन हूँ, मेरा उद्धार करें,  है शंकर मुझे अपनी शरण में ले लीजिए|

भावार्थ: यहाँ पर आत्मवत सर्व भूतेषु (सब को समान देखने) की दृष्टि के विकास की बात की गयी है| आदि शंकराचार्य ने ऐसी दृष्टि विकसित कर ली थी | साधारण व्यक्ति इस महान उपलब्धि को प्राप्त न कर सकने के कारण आदि शंकराचार्य की तुलना में अत्यंत दीन लगता है| वही दीन-हीन को ऊँचा उठा सकते है जो स्वयं उस दीन-हीन स्थिति से ऊपर उठ चुके है| ऐसे बुद्ध पुरुष आदि शंकराचार्य को दीन-हीनों का उद्धार करने के लिए प्रार्थना की गयी है|

 

जगतीमवितुं कलिताकृतयो विचरन्ति महामहसश्छलतः ।

अहिमांशुरिवात्र विभासि गुरो भव शंकर देशिक मे शरणम्॥६॥

जगत को (भोगवाद और भौतिक वाद) से बचाने महा तेजस्वी विभूतियाँ विविध रूपों में पृथ्वी पर आती है| इन सब विभूतियों में आप सूर्य की तरह चमकने वाले अर्थात श्रेष्ठ हो,  है शंकर मुझे अपनी शरण में ले लीजिए|   

भावार्थ: यहाँ पर संतो की महता की बात की गयी है| अगर संत न हो तो भोगवाद और भौतिकवाद में जगत का नाश हो जाए| ऐसे संतो में सर्व श्रेष्ठ आदि शंकराचार्य को अपनी शरण में लेने के लिए प्रार्थना की गयी है|

 

गुरुपुंगव पुंगवकेतन ते समतामयतां नहि को अपि सुधीः ।

शरणागतवत्सल तत्त्वनिधे भव शंकर देशिक मे शरणम्॥७॥

हे गुरुओं के श्रेष्ठ गुरु, भगवान शंकर, कोई भी बुद्धिमान आपके समकक्ष नहीं है, हे शरण में आए हुए का कल्याण करने वाले, तत्व ज्ञान के दाता, है शंकर मुझे अपनी शरण में ले लीजिए|   

भावार्थ: यहाँ पर आदि शंकराचार्य जो ज्ञानमार्ग के सर्वश्रेष्ठ आचार्य है उन्हें प्रार्थना की गयी है की शरण में आए हुए शिष्य का तत्व ज्ञान के माध्यम से उद्धार करें|

 

 विदिता न मया विशदैककला न च किंचन काञ्चनमस्ति गुरो ।

द्रुतमेव विधेहि कृपां सहजां भव शंकर देशिक मे शरणम्॥८॥

 

मुझे एक भी कला का ज्ञान नहीं है, मेरे पास धन भी नहीं है, मेरे पर कृपा करें , है शंकर मुझे अपनी शरण में ले लीजिए|   

भावार्थ: यहाँ पर ज्ञान प्राप्त करने की कला की बात की गयी है| जिसके पास ज्ञान प्राप्त करने की कला न हो उसके  विद्या धन नहीं हो सकता| ऐसा कला और धन विहीन व्यक्ति भी अगर आचार्य शंकर जैसे गुरु की शरण में जाए तो उसका उद्धार हो जाए, इसी लिए भगवान शंकर को अपनी शरण में लेने की प्रार्थना की गयी है| ये प्रार्थना ज्ञान के पिपासु सभी साधक के लिए उपयोगी सिद्ध होगी ऐसी आशा है| -डॉ. पीयूष त्रिवेदी (आदि शंकराचार्य जयंती, 28 अप्रैल 2020)